Thursday, July 8, 2010

पिपली लाईव में भारत लाईव .....

कपिलदेव अभिनीत एक जूते के विज्ञापन में एक डायलाग था "शुक्र है कुछ तो सिंपल है " ये बात आमिर खान की इस नयी फिल्म के विषय पर लागु होती है वर्ना तो आज भारतीयों के लिए फिल्मे बनाने का दौर ही ख़त्म होता जा रहा है ... छोटे शहरों ,कस्बों से एकल ठाठिया सिनेमा घरों के बंद होने से फिल्मकारों की नजर अब ओवरसीज की कमाई पर है ... हिंदी फिल्मे अब प्रवासी भारतीयों और अंग्रेजी के शिकार युवायों के लिए ही बनायीं जा रहीं हैं....अजीब से एग्लों इंडियन नाम ,अग्रेजी धुनों और गानों के जबदस्ती बनाये हिंदी अनुवाद और बिना सिर पैर की कहानी ....फिल्मों में भारतीय साज सुने जमाना बीत गया .... "पिपली लाका कहानी भारत की मिटटी से जुडी है इस में खुश फहमी में जी रही नयी पीढ़ी को "इंडिया " और "भारत" में फर्क भी महसूस होगा ....ठेठ देहाती अंदाज में गाया गीत "सखी संइयाँ तो बहुत की कमात है ,महगाई डायन खाए जात है " देश की सब से बड़ी समस्या पर करारा प्रहार है ....एक मुद्दत के बाद "फिल्म -निकाला" दे दिए गए ढोलक -बाजे के प्रयोग की हिम्मत की गयी है ..... जिस तरह "हम आप के हैं कौन " से शादियों वाली फिल्मे बनाने की होड़ लग गयी थी हो सकता है पिपली लाईव के बाद देश की दूसरी समस्यायों पर फिल्मों का दौर ही शुरू हो जाये ...अगर ऐसा हुआ तो जन संचार का ये ताकतवर जरिया अपने मूल उदेश्य पर फिर लौट आये गा .....---सुनील मोंगा ,सवाददाता इंडिया न्यूज़ .

No comments:

Post a Comment